Sunday, February 27, 2011

स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद

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स्वामी विवेकानंद
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स्वामी विवेकानन्द शिकागो में, 1893
चित्र में विवेकानन्द ने बांग्ला में व अंग्रेज़ी में लिखा है: “एक असीमित, पवित्र एवं शुद्ध -सोच एवं गुणों से परे, उस परमात्मा को मैं नतमस्तक हूं” - स्वामी विवेकानन्द
जन्म तिथि 12 जनवरी 1863
जन्म स्थान कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत
जन्म नरेंद्रनाथ दत्त
मृत्यु तिथि 4 जुलाई 1902 (39वर्ष )
मृत्यु स्थान बैलूर मठ निकट कोलकाता
गुरु/शिक्षक रामकृष्ण परमहंस
कथन Arise, awake; and stop not till the goal is reached.[१]
इस संदूक को: देखें  संवाद  सम्पादन
स्वामी विवेकानन्द (१२ जनवरी १८६३- ४ जुलाई १९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो नगर में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानंद की वक्तृता के कारण ही पँहुचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। रामकृष्ण जी बचपन से ही एक पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष थे। स्वामीजी ने कहा था की जो व्यक्ति पवित्र रुप से जीवन निर्वाह करता है उसके लिए अच्छी एकग्रता हासिल करना सम्भव है!

अनुक्रम

[संपादित करें] जीवन वृत्त

विवेकानंदजी का जन्म १२ जनवरी सन्‌ १८६३ को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहाँ उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।
सन्‌ १८८४ में श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

[संपादित करें] गुरु भेंट

रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंसजी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ।
स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूंक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे। वे सदा उनका आदर सत्कार करते थे। वे हमेशा उनसे ग्यान पाने कि लाल्सा रख्ते थे।

[संपादित करें] निष्ठा

एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेकते थे। गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।

[संपादित करें] यात्राएं

25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुँचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए। फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहाँ इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे। उनकी वक्ततृत्व शैली तथा ज्ञान को देखते हुये वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया। [२] अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा' यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। 4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे।  .

[संपादित करें]"Source"-wikipedia

PYAR KA IJHAAR

pani ki BECHAINI ka, EHSAS GHADE ko hai
DHARTI ke sukhe ka pta BAADAL ko hai
Fir bhi na jane kyo aisa hota hai
BAADAL jo Barsne se INKAR krta hai
CHAHAT bhi meri hai , kuchh aisi hi SANAM tumse
Mai tumse pyaar krta hu ,isbaat se AVGATnahi ho tum 
Pr kya aisa hai ki, Meri MOHHABAT ko SWIKAR karoge tum 
Mai tumse puchh nahi sakta,Ye meri VIVISTA hai
Ki Meri saso ke DORO ,se PYAAR karoge tum

KAVITA MERI AISI HAI......................

KAVATA meri aisi hai ki ,tum iski MAMTA ho;
Is KAVITA ka KAVI tum ho ,tum iski KAVITA bhi ho
Jaise KAVI dub ke apni ,KAVITA ko likhta rahta
Is KAVITA KA tum PUJA ho, jiski hamne PUJA ki thi
KAVITA ki ek LEKHANI hoti 
Is KAVITA me sab tum hi ho
Tum hi mera BHOOT bhi ho,aur aisa VARTAMAN bhi ho
Tum hi mera BHAVISHYA bhi ho,Tum hi to ek RAG bhi ho
Isse pahle koi KAVITA ,aisa to likha na hoga
Jiska RACHNA itni sundar ,U ski sundarta kya hogi
VARN tumhara CHANDAN sa hai , KESH tumhare  VRIKCHH  (tree) ki chhav
NETRA tumhare NADIYO jaise , jo KESH bhiga ke aati ho
Saath me apni THANDI HAVA ka jhoka lati hai
DIL krta hai ki lele han is THANDI  ka EHSAS jara
Fir lagta hai dar ye aisa BARF ke komal aahat ka
NAACHE to MAYUR ki jisi ,Tere NRITYA ka mai divana hu
VAADI (AAWAJ) teri aisi hai ,jo samne baithi MAATA hai
 

EHSAS

Ek pyari si Ladaki ke bin JIVAN suna lagta hai ;
In birani si rato me, jivan to KHILONA lagta hai
Shit ki maddham chavo me CHADAR to apna  lagta hai
In thandi hava ke jhoko me, Us pyari LADAKI ke bin JIVAN suna lagta hai

Fir sagar ki gahrai me kuchh DUDHLA-DHUDHLA dikhata hai
Shwet Salona rang hai uska ,BAAL sukhaya karti hai vo
JHIL si gahri ANKHE uski, KAJAL bhi kuchh dikhati hai
ONTH to uski LALI si hai , ki LAL rang FIKI pd jaye
Us pyari LADAKI ke bin JIVAN suna lagta hai

Us ke BAAL to aise jhume, ki thandi hava ka jhoka ho
Ji krta hai in JHOKO  me mai bhi PANCHHI bn UD jau
SAJI SAVRI  kuchh aisi baithi ,DULHAN si vo lagti hai
Kitabo ki PARIYA  bhi to  , Uske aage kuchh km lagati hai
Us pyari LADAKI ke bin JIVAN suna lagta hai

Mera mn kahata hai ki, SAB KUCHH chhod ab uska bn jau
Vo mil jaye to RAJA ,nahi to SANYASI bn jau
Uske kadamo ki aahat hai aisi ,ki GHADIYA tik-tik karti hai
Uske aane se lagta ho aisa , koi JHAJHKOR raha ho kaisa
Us pyari LADAKI ke bin JIVAN suna lagta hai

DHUP ki bhini-bhini KHUSUBU ka EHSAS hua ho mujhako
Fir ANKHE khuli to dekha ki ho gaya hai SAVERA
Fir HAATH me pani liye MA JHAJHKOR rahi hai mujhko
Kahti hai ab uth ja LALLA  ho gaya bahut SAVERA
Fir socha sapne bhi kya khub hote hai ,EHASAS hua tab mujhako
Us pyari LADAKI ke bin JIVAN suna lagta hai


Monday, November 29, 2010

Tuesday, November 16, 2010

nahi thi jisko  mere mohabbat ki kadar ittefaq se ussi ko chah rhe the
usi diye ne jalaya mere hatho ko ,jisko hawa se bacha rhe the