Wednesday, June 13, 2012

मुझको,तो तुमसे भी शिकायत है

कभी हम धून सजायेन्गे , कभी तुम गीते गाओगे |
वे दिन ना जाने अब,कब आयेन्गे ||
ना जाने क्या है खता मेरी,जो खुदा को भी माफ़ नही करता |
तुम्ही को दूर करता है,रातो को ख्वाबो मे तेरे ही सपने देता है ||

अगर मिले खुदा मुझको, तो मै तो पूछ ही लूगा |
जो मेरी खुदाई भी तुम्हे लगती थी प्यारी ,तो फ़िर क्यो मोहब्बत मे करनी थी दुस्वारी ||
अब तुम एक झलक उसका, भी तो दिखला नही सकते|
फ़िर किस इरादे से, तुम मन्दिर मे बैठे हो ||

ऐ आसमा मुझको ,तो तुमसे भी शिकायत है,कभी तेरी छाओ मे हमने कुछ पल बिताये थे |
फ़िर भी ना जाने क्यो तुने रोका नही उसको,जब जा रहा था वो मुझसे जुदा होकर ||
ऐ चन्दा मुझको,तो तुमसे भी शिकायत है जिस चाद्नी की रोशनी को देखने के खातीर, तू सारी रात जगता है |
तू उस रात भी जागा था, जब वो बन रही थी किसी गैर कि दुल्हन,फ़िर भी ना जाने क्यो तुने रोका नही उसको ||



ऐ हवा मुझको,तो तुमसे भी शिकायत है|याद कर उस दिन को तु सन्ग थी मेरे जब वो आया था घर पर |
फ़िर भी ना जाने क्यो ,फूलो से सजी डोली को, रोका नही तुने ||
किसी और को क्या कहना, मुझे तो खुद्से भी शिकायत है,|
किसी और के सपनो को पूरा करने मे,मैने क्यो आपना लूटा दिया सब कुछ ||

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