Wednesday, March 30, 2011

प्यार कहते है किसे

प्यार कहते है किसे ,मै कभी ना जान पाया 
भागा-भागा  जब  घर को आया, आंगन  मे तुमको  ही खडा पाया \\
पहली बार जो देखा था  तुमको , कुछ भी ना सोचा था मैने 
अपने हाथो की मेहदी  दिखाकर ,तुमने कुछ पूछा था मुझसे\\
  हो सकता है ये धुन्धली  यादे , तुमने दिल से   मिटा  दी हो 
पर मेरे दिल के मध्य मे ,इसका आज तक पहरा  है\\

जब मै विकट समस्या मे था ,तुमने उसको झट से सुलझाया 
प्यार कहते है किसे ,तब मुझे  समझ मे आया \\
सूरज की किरणो के बीच हम अंताछरिया और 
चन्दा की रोशनी मे पहेलिया खेला करते थे \\
पडोसी की शादी मे तुम ,मुझको भोजन परोसा करती थी 
पानी से भरे जग को मेरे सामने रख देती थी \
मै इतना गर्व से कह सकता हू ,तुम मेरा  ख्याल बहुत  रखती थी\\


एक दिन अचानक दोपहर को तुम अपने  घर को चली गयी 
तेरे इन यादो के सहारे , मै जीवन को जीता रहता था \\
दिल मे मेरे प्यार भरा था ,पर मै कहने से डरता था
शायद तुम्हारा दिल ना टूटे ,इसलिये कभी ना कहता था\\ 
कैरियर की आपाधापी मे ,मैने तुमको भूला दिया 
पर तेरे यादो के सहारे ,मैने जीवन का बाग सजाया था\\


सोच-समझ के विचार करके ,जब सोचा था तुमसे कह दूंगा 
तेरे सामने आने को ज्योहि हिम्मत जुटा रहा तथा मै\\
मुझसे पहले आकर ,किसी ने तेरा हाथ मांग लिया
मै भी आखीर क्या कहता,ये तो बस कहानी है \\
इसमे कुछ भी तो सार नही है बाबा
कुछ नये-पुराने किस्सो का मिलकर है ताना-बाना\\

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