Tuesday, March 1, 2011

कुमार विश्वास

  • 1चाद ने कहा
 चाँद ने कहा है, एक बार फिर चकोर से,
इस जनम में भी जलेगे तुम ही मेरी और से
हर जनम का अपना चाँद है, चकोर है अलग,
यूँ जनम जनम का एक ही मछेरा है मगर,
हर जनम की मछलियाँ अलग हैं डोर है अलग,
डोर ने कहा है मछलियों की पोर-पोर से
इस जनम में भी बिंधोगी तुम ही मेरी ओर से
इस जनम में भी जलोगी तुम ही मेरी ओर से
   
यूँ अनंत सर्ग और ये कथा अनंत है
पंक से जनम लिया है पर कमल पवित्र है
यूँ जनम जनम का एक ही वो चित्रकार है 
हर जनम की तूलिका अलग, अलग ही चित्र है 
ये कहा है तूलिका ने, चित्र के चरित्र से 
इस जनम में भी सजोगे तुम ही मेरी कोर से 
चाँद ने कहा है एक बार फिर चकोर से     
इस जनम में भी जलोगी तुम ही मेरी ओर से

हर जनम के फूल हैं अलग, हैं तितलियाँ अलग
हर जनम की शोखियाँ अलग,  हैं सुर्खियाँ अलग
ध्वँस और सृजन का एक राग है अमर, मगर
हर जनम का आशियाँ अलग, है बिजलियाँ अलग
नीड़ से कहा है बिजलियों  ने जोर शोर से    
इस जनम में भी जलोगी तुम ही मेरी ओर से
इस जनम में भी मिटोगे तुम ही मेरी ओर से 
                                                 चाँद ने कहा है एक बार फिर चकोर
  • 2

    तुम अगर नहीं आयीं…गीत गा ना पाऊँगा.
    साँस साथ छोडेगी सुर सजा ना पाऊँगा..
    तान भावना की है..शब्द शब्द दर्पण है..
    बाँसुरी चली आओ..होट का निमन्त्रण है..

    तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है..
    तीर पार कान्हा से दूर राधिका सी है..
    दूरियाँ समझती हैं दर्द कैसे सहना है..
    आँख लाख चाहे पर होठ को ना कहना है
    औषधी चली आओ..चोट का निमन्त्रण है..
    बाँसुरी चली आओ होठ का निमन्त्रण है

    तुम अलग हुयीं मुझसे साँस की खताओं से
    भूख की दलीलों से वक़्त की सजाओं ने..
    रात की उदासी को आँसुओं ने झेला है
    कुछ गलत ना कर बैठे मन बहुत अकेला है
    कंचनी कसौटी को खोट ना निमन्त्रण है
    बाँसुरी चली आओ होठ का निमन्त्रण है

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    ओ कल्पव्रक्ष की सोनजुही..
    ओ अमलताश की अमलकली.
    धरती के आतप से जलते..
    मन पर छाई निर्मल बदली..
    मैं तुमको मधुसदगन्ध युक्त संसार नहीं दे पाऊँगा
    तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा.
    तुम कल्पव्रक्ष का फूल और
    मैं धरती का अदना गायक
    तुम जीवन के उपभोग योग्य
    मैं नहीं स्वयं अपने लायक
    तुम नहीं अधूरी गजल सुभे
    तुम शाम गान सी पावन हो
    हिम शिखरों पर सहसा कौंधी
    बिजुरी सी तुम मनभावन हो.
    इसलिये व्यर्थ शब्दों वाला व्यापार नहीं दे पाऊँगा
    तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
    तुम जिस शय्या पर शयन करो
    वह क्षीर सिन्धु सी पावन हो
    जिस आँगन की हो मौलश्री
    वह आँगन क्या व्रन्दावन हो
    जिन अधरों का चुम्बन पाओ
    वे अधर नहीं गंगातट हों
    जिसकी छाया बन साथ रहो
    वह व्यक्ति नहीं वंशीवट हो
    पर मैं वट जैसा सघन छाँह विस्तार नहीं दे पाऊँगा
    तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
    मै तुमको चाँद सितारों का
    सौंपू उपहार भला कैसे
    मैं यायावर बंजारा साँधू
    सुर श्रंगार भला कैसे
    मैन जीवन के प्रश्नों से नाता तोड तुम्हारे साथ सुभे
    बारूद बिछी धरती पर कर लूँ
    दो पल प्यार भला कैसे
    इसलिये विवष हर आँसू को सत्कार नहीं दे पाऊँगा
    तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
    तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा

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                                                                                        पल भर में जीवन महकये 

                                                                                        पल भर में संसार जलाएं 

    कभी धुप हैं, कभी छाँव हैं 
    वुर्फ़ कभी अंगार 
    लड़कियां जैसे पहला प्यार 

    बचपन के जाते ही इनकी 
    गंध बसे तन मन में 
    एक कहानी लिख जाती हैं 
    ये सबके जीवन में 
    बचपन की ये विदा निशानी 
    यौवन का उपहार 
    लड़कियां जैसे पहला प्यार 

    इनके निर्णय बड़े अजब हैं 
    बड़ी अजब हैं बातें 
    दिन की कीमत पर,
    गिरबी रख देती हैं रातें 
    हंसते-गाते कर जाती हैं 
    आंसू का व्यापार
    लड़कियां जैसे पहला प्यार 

    जाने कैसे, कब कर बैठें 
    जान बूझकर भूलें 
    किसे प्यास से व्याकुल कर दें 
    किसे अधर से छू लें 
    किसका जीवन मरुथल कर दें 
    किसका मस्त बहार 
    लड़कियां जैसे पहला प्यार 

    इसकी खातिर भूखी-प्यासी 
    दहें रात भर जागें 
    उसकी पूजा को ठुकरायें 
    छाया से भी भागें 
    इसके सम्मुख छुई मुई हैं 
    उसको है तलवार 
    लड़कियां जैसे पहला प्यार 

    राजा के सपने मन में हैं 
    और फकीरों संग हैं 
    जीवन औरों के हाथों में 
    खींची लकीरों संग हैं 
    सपनों सी जगमग जगमग हैं 
    किस्मत सी लाचार 
    लड़कियां जैसे पहला प्यार
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    मेरा अपना तजुर्बा है तुम्हें  बतला रहा हूँ मैं
    कोई लब छू गया था तब अभी तक गा रहा हूँ मैं 
    फिराके यार में कैसे जिया जाये बिना तड़फे 
    जो मैं खुद ही नहीं समझा वही समझा रहा हूँ मैं  

    किसी पत्थर में मूरत है कोई पत्थर की मूरत है 
    लो हमने देख ली दुनिया जो इतनी ख़ूबसूरत है 
    ज़माना अपनी समझे पर मुझे अपनी खबर ये है 
    तुम्हें मेरी जरूरत है मुझे तेरी जरूरत है

     

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