नारी के होते है , सब रूप अनेक
कभी वो ममता बनकर ,कभी दुर्गा के रूप मे लेती अवतार \\
नारी वृच्छ की छाव सी होती ,तपती धूप भी हिला न पाये
घनघोर पवन छू भी ना पाये,बारिस फीकी पड जाय \\
बाहर से पत्थर की काया ,भीतर से मोम सी कोमल
ऐसी प्यारी छवि को हम सब नारी कहते है \\
हर एक रूप मे वो खरी उतरती है
फिर चाहे वो पत्नी हो माँ हो चाहे घर की लक्ष्मी हो \,
माँ के उस आँचल मे बच्चा जब जन्म लेता है \\
दुःख के थपेडो को सहकर , एक नारी ही सींचा करती है
लक्ष्मी बनकर मे आती ,उपवन सा घर संसार चलाती है
पत्नी के छवि मे वो ,जीवन भर साथ निभाती है \\
सात जन्मो के,सात कसमो को अपने माथो से लगाती है
प्रेम की इस मर्यादा मे, एक ताजमहल बन जाता है\\
प्रकृति की इस रचना को हम सब नारी कहते है
साई की भी क्या रचना है,जो नारी ऐसी मृदभावन है
कि दिमाग की जगह दिल दे डाला ,दिल की जगह दिमाग\\
जो वे दिल से ही सोचा करती है, दिल से ही करा करती है
क्योकि दिल ही मे साई होता है
उसकी ऐसी रचना को, हम बारम्बार नमन करते है\
ऐसी ही छवि को हम सब नारी कहते है\\
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